Friday, February 14, 2025

लघुकथा – मेड़

 मेड़


मेड़ पर बैठे बच्चालाल अपने धान के खेत देख रहे थे - 

'बादलों के धोखा देने पर भी फसल लहलहा उठी थी। अपने बोरिंग और पम्पिंग सेट की मेहरबानी..... खेत कितना अच्छा लगता है ।' 

बगल के खेत में पड़ोसी के धान भी थे। पर पानी न मिलने से लगता था कि इस बार फसल खराब हो जायेगी।

'अच्छी बात है,'

बच्चालाल सोचने लगे,

'और आए लड़ने....अब पता चलेगा .....जब खाने को नहीं रहेगा तो फिर लड़ना भूल जाएगा ....जब देखो कूद कर चला आता है .....भला बच्चों के झगड़े पर भी लड़ा जाता है?'

"बेवकूफ,"

बच्चालाल के मुँह से अनायास ही निकल गया.....

'फिर भी है तो पड़ोसी ही। अगर एक बार पानी पा जाता तो खेत लहलहा उठता ....।'

'एक बार कहता तो क्या चला नही देता ....बड़ा स्वाभिमानी बनता है ...

अबकी बार स्वाभिमान की मिट्टी न पलीद हुई तो ........बच्चे भूख से बिलखेंगे तब आयेगा औकात पर।'


बच्चा लाल को अपने बचपन के दिन याद आ गए ....झगड़ों की पुरानी परंपरा है उनके यहां। बहुत बार झगड़ा और मेल - मिलाप हुआ है ....

ऐसे भी दिन थे जब बच्चा के दादा पड़ोसी के दादा से चावल मांगने गए थे ......।'

बच्चालाल को अभी भी याद है ....दादा कह रहे थे बाल - बच्चों की बात है वरना कभी किसी के सामने हाथ नही फैलाता।

'अब उसके बच्चे भी.....'

धान की बाली को हाथ में लेकर कुछ देर वो यूं ही बैठे रहे। देर तक उसे देखते रहे...

फिर अचानक उठ कर पंपिंग सेट चालू कर मेड़ तोड़ दिए। पड़ोसी के खेत में पानी छलछला कर जाने लगा। धान के पौधे पानी पाकर सीधे होने लगे।


धन्यवाद!


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